तुने  जो  ना  कहा  में  वोह  सुनता  रहा
खामखा  बेवजा  ख्वाब  बुनता  रहा…

जाने  किसकी  हमें  लग  गयी  है  नज़र
इस  शहर  में  ना  अपना  ठिकाना  रहा
दूर  चाहत  से  में  अपनी  चलता  रहा
खामखा  बेवजा  ख्वाब  बुनता  रहा…
दर्द  पहले  से  है  ज्यादा
खुद  से  फिर  यह  किया  वादा
खामोश  नज़रें  रहे  बेजुबान….
अब ना  पहले  सी  बातें  है,
बोलो  तो  लब   थर  थराते  है
राज़  यह  दिल  का  ना  हो  बयान
हो  गया  के  आसार  कोई  हम  पे  नहीं
हमसफ़र  में  तोह  है  हमसफ़र  है  नहीं
दूर  जाता  रहा  पास  आता  रहा
खामखा  बेवजा  ख्वाब  बुनता  रहा…
आया  वोह  फिर  नज़र  ऐसे
बात   छिड़ने  लगी  फिर  से
आँखों  में  चुबता  कल  का  धुँआ
हाल  तेरा  ना  हम  सा  है
इस  ख़ुशी  में  क्यूँ  ग़म  सा  है
बसने  लगा  क्यूँ  फिर  वोह  जहाँ
वोह  जहाँ  दूर  जिससे  गए  थे  निकल
फिर  से  यादों  ने  कर  दी  है  जैसे  पहल
लम्हा  बीता  हुआ  दिल  दहकता  रहा
खामखा बेवजा  ख्वाब  बुनता  रहा …..
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It just feels so close to the heart… like they say “never expect life to be fair“, so true. Somethings just happen and we are meant to deal with them. But things that this brain understands are not in sync with the heart…some wounds just never heal.
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